मंगलवार, 3 जनवरी 2017

गली में आज चाँद निकला - पुष्पा पटेल

तुम आए जो आया मुझे याद, गली में आज चाँद निकला
जाने कितने दिनों के बाद, गली में आज चाँद निकला

ये नैना बिन काजल तरसे, बारह महीने बादल बरसे
सुनी रब ने मेरी फ़रियाद, गली में आज चाँद निकला

आज की रात जो मैं सो जाती, खुलती आँख सुबह हो जाती
मैं तो हो जाती बस बर्बाद, गली में आज चाँद निकला

मैं ने तुमको आते देखा, अपनी जान को जाते देखा

जाने फिर क्या हुआ नहीं याद, गली में आज चाँद निकला

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सोमवार, 26 दिसंबर 2016

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले - मिर्जा गालिब

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले|

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर,
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले|

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले|

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का,
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले|

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये,
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले|

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी,
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले|

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की,
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले|

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का,
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले|

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले,
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले|

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम,
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले|

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़,
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले|

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आ की मेरी जान में क़रार नही है - मिर्ज़ा ग़ालिब

आ की मेरी जान में क़रार नही है,
ताक़त-ए-बेदद-ए-इंतज़ार नही है|

देते हैं जन्नत हयात-ए-दहर के बदले,
नशा बा अंदाज़ा-ए-खुमार नही है|

गिरिया निकले है तेरी बाज़म से मुझ को,
हाय! के रोने पे इख्तियार नही है|

हम से अबस है गुमान-ए-रंजिश-ए-खातिर,
खाक में उशशाक़ की गुबार नही है|

दिल से उठा लुत्फ़-ए-जलवा हाय मानी,
गैर-ए-गुल आईना-ए-बाहर नही है|

क़त्ल का मेरे किया है अहद तो बारे,
वाए! अगर अहद उस्तावर नही है|

तू ने क़सम मैकशी की खाई है 'ग़ालिब',
तेरी क़सम का कुछ ऐतबार नही है|

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जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नही रहा - मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्ज़-ए-नियाज़-ए-इश्क़ के क़ाबिल नही रहा,
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नही रहा|

जाता हूँ दाग-ए-हसरत-ए-हस्ती लिए हुए,
हूँ शम्मा-ए-कुश्ता दरख़ुर-ए-महफ़िल नही रहा|

मरने की आई दिल और ही तदबीर करके मैं,
शयन-ए-दस्त-ओ-बाज़ू-ए-क़ातिल नही रहा|

बा-रु-ए-शश जीहत दर-ए-ऐनबाज़ है,
या इमियज़-ए-नाकिस-ओ-क़ामिल नही रहा|

वा कर दिए हैं शौक़ ने बंद-ए-नक़ाब-ए-हुस्न,
गैर आज़ निगाह अब कोई हेल नही रहा|

गो मैं रहा राहें-ए-सितम हाए रोज़गार,
लेकिन तेरे ख़याल से गाफिल नही रहा|

दिल से हवा-ए-किश्त-ए-वफ़ा मिट की वा,
हासिल सिवाए हसरत-ए-हासिल नही रहा|

बेदाद-ए-इश्क़ से नही डरता मगर 'असद',
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नही रहा|

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तू क्या है? - मिर्ज़ा ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम के "तू क्या है?"
तुम्ही कहो के यह अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू क्या है|

ना शोले मैं यह करिश्मा ना बर्क़ मैं यह अदा,
कोई बताओ के वो शोख-ए-तुंड ओ खु क्या है|

यह रश्क है के वो होता है हम-सुखन तुमसे,
वरना ख़ौफ़-ए-बाद'आमोज़ी-ए-उड़ू क्या है|

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैरहण,
हमारी जाब को अब हाजत-ए-रफू क्या है|

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा,
खुरेदते हो जो अब रख, जूसतुजू क्या है|

रागों मैं दौड़ते फिरने के हम नही कायल,
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है|

वो चीज़ जिस के लिए हो हमें बहिश्त अज़ीज़,
सिवाए बाड़ा-ए-गुलफाम-ए-मुश्काबू क्या है|

पियूं शराब अगर कम भी तो देख लूँ दो चार,
यह शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है|

रही ना ताक़त-ए-गुफ्तार और अगर हो भी,
तो किस उमीद पे कहिए कह आरज़ू क्या है|

बना है शह का मसाहिब, फिरे है इतराता,
वरना शहर मैं 'ग़ालिब' की आबरू क्या है|

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